हज़ारों साल पुराना मंदिर तस्दीक करता है यहीं जन्मे थे भगवान परशुराम i
इनके पिता का नाम ऋचीक और माता का नाम सत्यवती था इनके पिता का आश्रम गंगा और काली नदी के संगम के पास आधुनिक कन्नौज के उत्तर अश्वतीर्थ नामक स्थान पर था। मान्यता है कि उस समय इस भूभाग पर महर्षि विश्वामित्र के पिता राजा गाधि शासन करते थे। जमदग्नि की माता सत्यवती राजा गाधि की कन्या थी महर्षि ऋतिक ने महर्षि अगस्त्य के अनुरोध पर जमदग्नि को महर्षि अगस्त्य के साथ दक्षिण में कोंकण प्रदेश में धर्म प्रचार का कार्य करने लगे। कोंकण प्रदेश का राजा जमदग्नि की विद्वता पर इतना मोहित हुआ कि उसने अपनी पुत्री रेणुका का विवाह इनसे कर दिया।
इन्हीं रेणुका के पांचवें गर्भ से भगवान परशुराम का जन्म हुआ। जमदग्नि ने गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के बाद धर्म प्रचार का कार्य बंद कर दिया और राजा गाधि की स्वीकृति लेकर उन्होंने अपना जमदग्नि आश्रम स्थापित किया और अपनी पत्नी रेणुका के साथ वही रहने लगे राजा गाधि ने वर्तमान जलालाबाद के निकट की भूमि जमदग्नि के आश्रम के लिए चुनी थी। जमदग्नि ने आश्रम के निकट रेणुका के लिए बनवाई थी। आज उस कुटी के स्थान पर एक अति प्राचीन मंदिर बना हुआ है जो आज 'ढकियाइन' देवी के नाम से प्रसिद्ध है।
'ढकियाइन' शुद्ध संस्कृत का शब्द है। जिसका शाब्दिक अर्थ है वह देवी जिसका जन्म दक्षिण में हुआ हो रेणुका कोकण नरेश की पुत्री थी तथा कोकण प्रदेश दक्षिण भारत में स्थित है यह वही पवित्र भूमि है जिस पर भगवान परशुराम पैदा हुए थे। जलालाबाद से पश्चिम करीब 2 किलोमीटर दूर माता रेणुका देवी तथा ऋषि जमदग्नि की मूर्तियों वाला अति प्राचीन मंदिर इस आश्रम में आज भी मौजूद है तथा पास में ही कई एकड़ में फैली जमदग्नि नाम की झील भगवान परशुराम के जन्म स्थान पर होने की प्रमाणिकता को और भी सिद्ध करती है इस आश्रम पर हर साल तीन दिवसीय मेला लगता है जिसमें दूरदराज से आने वाले श्रद्धालु माता का आशीर्वाद पाते हैं इसके अलावा हर साल यहां होने वाली देवी जात में भक्तों की भारी भीड़ जुटती है
बताया जाता है कि भगवान परशुराम अपने विजय अभियान से लौटे तब तक उनके सभी पूर्वजों का स्वर्गवास हो चुका था वापस लौटने पर उन्होंने अपने पूर्वजों का पिंडदान किया गया जलालाबाद से करीब 5 किलोमीटर दूर शाहजहांपुर रोड पर न केवल इस नाम का गांव मौजूद है बल्कि वहां काफी पुराना मंदिर भी है जहां हर साल मेला भी लगता है अपने विजय अभियान से वापस लौटने पर जहां लोगों ने भगवान परशुराम का स्वागत सत्कार किया उस स्थान को अतिपरा कहा गया जो अतिभ्रंश होकर अतिबरा हो गया और इसी नाम से यहां गांव बसा हुआ है।
कटका तथा गुनारा दोनों गांव भी भगवान परशुराम से जुड़े रहे जो आज भी मौजूद है। ग्राम कटका के पास ही भगवान परशुराम तथा सहस्त्रबाहु का महासंग्राम हुआ था। जबकि गुनारा का भट्ट परिवार इस आश्रम से संबंधित रहा। जमदग्नि आश्रम से करीब 2 किलोमीटर पूर्व दिशा में भगवान परशुराम का हजारों साल पुराना मंदिर है इस मंदिर के सामने कई एकड़ में फैला ताल, राम ताल के नाम से विख्यात है।
भगवान परशुराम का मंदिर करीब 20 फीट के एक ऊंचे टीले पर स्थित है मंदिर के मुख्य द्वार पर एक विशालकाय फंरसा लगा हुआ है बताते हैं कि सन उन्नीस सौ पांच में तत्कालीन तहसीलदार प्रभु दयाल ने मंदिर के पास टीले की खुदाई कराई थी तब यह फरसा मिट्टी में दबा हुआ मिला था इसके अलावा खुदाई के दौरान खरोष्ठी लिपि में लिखे दो शिलालेख भी मिले हैं। यह शिलालेख मंदिर में मौजूद नहीं है। तहसीलदार ने मलबे से निकले उस फरसे का परीक्षण करवाया था तो बताया गया था कि इस फरसे की उम्र करीब 1000 साल पुरानी है उस दौरान होते रहे आक्रमणों के दौरान मंदिर का स्वरूप बनता बिगड़ता रहा परंतु मंदिर में स्थापित भगवान परशुराम की मूर्ति वही है। यह मंदिर कस्बे के मोहल्ला खेड़ा में स्थित है। इस मंदिर की प्राचीनता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि निजामिया की अति प्राचीन दरगाह में उर्दू में लिखी पुस्तक मिली थी
जिसका नाम था ''तस्वीरें मासूम उलू रऊफ रहनुमाये तरीकत''। इस पुस्तक के 170 वें पृष्ठ पर अंकित है कि जब शाह रहमतुल्लाह आल्हा राजकुमार मियां मुस्ताक दीवान के साथ इस कस्बे में आए तो उस दौरान यहां आबादी नहीं थी उत्तर की ओर कुछ हिंदू जोगी साधु रहते थे तथा मंदिर स्थित था इस विवरण से स्पष्ट होता है कि जब निजाम शाबरी मियां यहां आए तब भी यहां मंदिर स्थापित था। इतिहासकारों के अनुसार निजाम शाबरी मियां प्रांत से धर्म का प्रचार करने 1034 हिजरी में हिंदुस्तान आए थे। हजारों साल पहले जोगी खेड़ा के नाम से पुकारे जाने वाला यह इलाहाबाद में परशुरामपुरी के नाम से विख्यात रहा।
इतिहासकारों के अनुसार मुगल शासन के दौरान यहां शासक रहे हकीम अहमद खान ने अपने मझले पुत्र जलालुद्दीन का विवाह यहां आकर बसे अफगान कबीले के यूसुफजई में किया था और यह पूरा इलाका अपनी पुत्रवधू को मेंहर में दे दिया इसके बाद से इस क्षेत्र का नाम जलालाबाद प्रचलित हो गया जो आज तक चला आ रहा है। लंबे समय से की जा रही मांग के बावजूद सरकार ने भले ही इसे भगवान परशुराम की जन्मस्थली होने का दर्जा न दिया हो लेकिन प्रदेश ही नहीं बल्कि दूर-दूर तक भगवान परशुराम की पावन नगरी उनकी जन्म स्थली के रूप में विख्यात है। भगवान परशुराम का शोध करने वाले देश के कई प्रांतों के विद्वानों ने भगवान परशुराम से जुड़े देश तथा विदेश के तमाम स्कूलों का गहन अध्ययन करने के बाद उन्होंने जलालाबाद में स्थित भगवान परशुराम मंदिर ऋषि जमदग्नि आश्रम तथा परशुराम से जुड़े अनेक स्थलों को सबसे ज्यादा प्रमाणित मानते हुए इस नगरी को ही भगवान परशुराम की जन्मस्थली होना माना है।
आज जनमानस में इसी दृढ़ता के चलते इस मंदिर की महत्ता की गहराई तक जमी हुई है। यहां सालभर मुंडन संस्कार अनुशासन तथा शादी के बाद बधु को मंदिर पर भगवान के दर्शन कराने के बाद घर पर प्रवेश कराने के कार्यक्रम बराबर चलते रहते हैं। इसके अलावा भगवान परशुराम रामलीला कमेटी की ओर से हर साल क्वार के महीने में रामलीला रासलीला तथा नाटक आदि धार्मिक आयोजन कराए जाते हैं। जबकि भगवान परशुराम के जन्मदिवस वैशाख मास की चतुर्थी आपको भगवान परशुराम जन्म भूमि प्रबंध समिति यहां विशेष आयोजन कराती है जो पूरे सप्ताह चलते हैं।
इसके तहत सप्ताह भर श्रीमद् भागवत कथा तथा अक्षय तृतीया को भगवान परशुराम का जलाभिषेक इसी दिन 8 कुंडली विशाल यज्ञ परशुराम की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है इसके बाद भंडारे का आयोजन होता है। साथ ही समिति की ओर से हर पूर्णमासी को मंदिर पर भजन कीर्तन के बाद भंडारा होता है। भगवान परशुराम मंदिर से जुड़ी एक अन्य संस्था परशुराम सर्वजन कल्याण समिति की ओर से सामाजिक कार्यक्रम कराए जाते हैं भगवान परशुराम जन्म भूमि को समर्पित इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर भगवान परशुराम से जुड़े विभिन्न स्थलों का विकास तथा उनका संरक्षण कराने को लंबे समय से आंदोलन कर रही थी जिस पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने यहां को पर्यटन स्थल घोषित कर दिया।

Jai shree Ram
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